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भ्रष्टाचार के आरोपी आलोक वर्मा CBI के निदेशक नहीं रहे. जबरन छुट्टी पर भेजे गए वर्मा एक दिन पहले ही सुप्रीम कोर्ट के आदेश से CBI में वापस लौटे थे. सुप्रीम कोर्ट ने वर्मा को CBI में वापस भेजने के साथ ही आदेश में यह भी साफ कर दिया था कि अंतिम फैसला चयन समिति ही करेगी. आज चयन समिति ने उन्हें निदेशक पद से हटाने का फैसला सुनाया. समिति के सदस्य के तौर पर प्रधानमंत्री और मुख्य न्यायाधीश के प्रतिनिधि के रूप में आए जस्टिस सीकरी ने एक मत से वर्मा को हटाने का फैसला लिया. जबकि कांग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने इसका विरोध किया. वर्मा को बाकी बचे 21 दिनों के कार्यकाल के लिए फायर सर्विस का महानिदेशक बना दिया गया है. वर्मा की अनुपस्थिति में CBI निदेशक का कार्यभार संभालने वाले एम नागेश्वर निदेशक की नयी नियुक्ति तक कार्यवाहक निदेशक के रूप में कार्य करंगे. आलोक वर्मा ने 23 अक्टूबर की रात को जबरन छुट्टी पर भेजे जाने को इस आधार पर चुनौती दी थी कि उन्हें हटाने का अधिकार सिर्फ चयन समिति को है, सरकार अपने स्तर पर यह फैसला नहीं ले सकती. उधर सरकार का कहना था कि आलोक वर्मा को निदेशक पद से नहीं हटाया गया है, बल्कि भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच को देखते हुए CVC की सिफारिश पर उनसे कार्यभार ले लिया गया है. सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की दलील को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि कार्यभार छीनने का फैसला भी सिर्फ चयन समिति ही कर सकती है. वर्मा को CBI निदेशक पद पर बहाल करते हुए भी सुप्रीम कोर्ट ने उनके द्वारा नीतिगत फैसले लेने पर रोक लगा दी थी. सुप्रीम कोर्ट के आदेश से बाद आलोक वर्मा ने बुधवार को ही CBI निदेशक का कार्यभार संभाल लिया और एम नागेश्वर राव के फैसले को बदलते हुए विशेष निदेशक राकेश अस्थाना के खिलाफ जांच कर रहे अधिकारियों को वापस मुख्यालय बुला लिया. सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद चयन समिति की बैठक बुलायी पर बुधवार को देर शाम हुई चयन समिति की पहली बैठक में कोई फैसला नहीं हो पाया. लोकसभा में सबसे बड़ी पार्टी के नेता के रूप में चयन समिति में शामिल मल्लिकार्जुन खड़गे ने न सिर्फ आलोक वर्मा को CBI निदेशक की पूरी शक्ति देने की मांग उठायी बल्कि यह भी कहा कि छुट्टी पर भेजे जाने से बर्बाद हुए 77 दिन का वर्मा का कार्यकाल और बढ़ाया जाए. उन्होंने 23-24 अक्टूबर को वर्मा के हटाए जाने की परिस्थितियों के जांच की भी जरूरत बतायी. लेकिन भारत के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई के प्रतिनिधि के तौर पर चयन समिति की बैठक में शामिल जस्टिस एके सिकरी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वर्मा के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच को लंबित रहने के मद्देनजर वर्मा को CBI निदेशक के रूप में बनाए रखने को उचित नहीं माना. CBI के विशेष निदेशक राकेश अस्थाना ने आलोक वर्मा पर लालू यादव के खिलाफ होटल के बदले जमीन घोटाले में छापा में रुकावट डालने से लेकर मांस व्यापारी मोईन कुरैशी के मामले में दो करोड़ रुपये की रिश्वत लेने सहित कई आरोप लगाए थे. इसीके साथ अस्थाना की जांच टीम ने सतीश बाबु सना से CRPC की धारा 161 के तहत बयान भी दर्ज करा लिया था, जिसमें उसने आलोक वर्मा को रिश्वत देने की बात मानी थी. दूसरी ओर आलोक वर्मा ने भी उसी सतीश बाबु सना का CRPC की धारा 164 के तहत एक बयान दर्ज करा लिया, जिसमें सना ने राकेश अस्थाना पर दो करोड़ 95 लाख रुपये रिश्वत लेने का आरोप लगाया. आलोक वर्मा के निर्देश पर राकेश अस्थाना के खिलाफ FIR भी दर्ज कर ली गई. दो शीर्ष अधिकारियों का झगड़ा सार्वजनिक होने और CBI की साख को रसातल में जाते देख सरकार को हस्तक्षेप करना पड़ा. सरकार ने CVC की सिफारिश पर आलोक वर्मा और राकेश अस्थाना दोनों से कार्यभार ले लिया. अंततः यह लड़ाई आलोक वर्मा को भारी पड़ी.
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