आम चुनाव 2019 के पहले केंद्र सरकार ने एक बड़ा फैसला लेते हुए आर्थिक रूप से कमजोर सवर्ण जातियों को दस फीसदी आरक्षण देने का फैसला किया है. सोमवार को हुई केंद्रीय कैबिनेट की बैठक में यह फैसला किया गया. इसे BJP का चुनाव पूर्व मास्टर स्ट्रोक माना जा रहा है. जबकि विपक्ष इसे एक चुनावी जुमला और मजाक बता रहा है. मोदी सरकार इस संदर्भ में संविधान संशोधन बिल मंगलवार को ही संसद में पेश कर सकती है. इसका लाभ उन सभी आर्थिक रूप से कमजोर सवर्ण जातियों को मिलेगा जो अभी तक किसी भी तरह के आरक्षण के अंतर्गत नहीं आते थे. केंद्रीय सामाजिक न्याय राज्य मंत्री विजय सांपला के अनुसार इसका लाभ लेने के वो लोग पात्र होंगे जिनकी सालाना आय आठ लाख रूपये से कम होगी, जिनके पास पांच लाख से कम की खेती योग्य जमीन होगी, जिनके पास एक हजार स्क्वायर फीट से कम का घर या आवासीय प्लाट हो, जिनके पास अधिसूचित नगर पालिका क्षेत्र में 100 गज से कम या गैर अधिसूचित नगर पालिका क्षेत्र में 200 गज से कम का आवासीय प्‍लॉट है. इसका लाभ मुस्लिम सहित तमाम धार्मिक अल्पसंख्यकों के सामान्य श्रेणी वाले गरीबों को भी मिलेगा. लेकिन जिस व्यक्ति के पास तय सीमा से अधिक संपत्ति होगी, उसे इसका लाभ नहीं मिलेगा. मोदी सरकार ये आरक्षण आर्थिक आधार पर ला रही है, जिसकी संविधान में अभी कोई व्यवस्था नहीं है. संविधान में जाति के आधार पर आरक्षण की बात कही गई है. ऐसे में सरकार को इसको लागू करने के लिए जल्द ही संविधान के अनुच्छेद 15 और अनुच्छेद 16 में संशोधन करना होगा, जिससे आर्थिक आधार पर आरक्षण देने का रास्ता साफ हो जाएगा. पिछले साल जब सुप्रीम कोर्ट ने SC/ST एक्ट में बदलाव करने का आदेश दिया था, तब केंद्र सरकार ने कोर्ट का फैसला बदल दिया था. बताया जा रहा है कि आरक्षण का फॉर्मूला 50%+10% का होगा. केंद्र सरकार के इस फैसले के बाद राजनीतिक प्रतिक्रियाएं आनी भी शुरू हो गई हैं. वित्त राज्यमंत्री शिवप्रताप शुक्ला ने कहा कि इसे कहते हैं 56 इंच के सीने वाला फैसला. ज्ञात है कि सर्जिकल स्ट्राइक के वक्त प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि पाकिस्तान की सीमा में घुसकर ऑपरेशन को अंजाम देने का मद्दा 56 इंच का सीना रखने वाले ही कर सकते हैं. BJP के राष्ट्रीय प्रवक्ता शाहनवाज हुसैन ने कहा कि PM मोदी की नीति है- “सबका साथ सबका विकास”. वो देश की जनता के लिए काम कर रहे हैं, सरकार ने सवर्णों को उनका हक दिया है. गरीब सवर्णों को आरक्षण मिलना ही चाहिए. केंद्रीय मंत्री रामदास अठावले ने इस फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि सरकार का ये फैसला काफी अच्छा है, इससे समाज के एक बड़े तबके को लाभ होगा. सवर्णों में भी कई ऐसे लोग हैं जो आर्थिक रूप से काफी कमजोर हैं. उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने कहा कि- “बहुत देर कर दी मेहरबां आते-आते”, ये फैसला चुनाव को देखते हुए किया गया है, अब वो चाहे जो भी जुमला दे लेकिन ये सरकार बचने वाली नहीं हैं. कांग्रेस नेता और वरिष्ठ वकील केटीएस तुलसी ने मोदी सरकार के इस फैसले को मजाक बताते हुए कहा कि ये लोग जनता को बेवकूफ बनाने का काम कर रहे हैं, इस बिल को ये पास ही नहीं करवा सकते हैं. जब कोई साधारण बिल पास नहीं हो पा रहा है तो फिर ये बिल कैसे पास हो पाएगा? कांग्रेस के अमी याज्ञनिक ने कहा कि इस प्रकार के आरक्षण पर काफी तकनीकि दिक्कतें हैं, लोकसभा चुनाव से पहले इस प्रकार आरक्षण देने का क्या मकसद है? इस मुद्दे पर बिल आने और पास होने में काफी समय लग सकता है, सरकार इस मुद्दे को लेकर सीरियस नहीं है. राजद नेता मनोज झा ने भी कहा कि लोकसभा चुनाव को देखते हुए इस फैसले को लिया गया है जो सिर्फ एक चुनावी जुमला है. पाटीदार नेता हार्दिक पटेल ने कहा संसद के आखिरी दिनों में इस प्रकार का फैसला करना सरकार का नया नाटक मात्र है.
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